घूँट भर ख़्वाहिश नहीं है
मैं समंदर चाहता हूँ
लूट लो तुम ये हवाएँ
मैं बवंडर चाहता हूँ
- – Vishakt ki Kalam se
घूँट भर ख़्वाहिश नहीं है
मैं समंदर चाहता हूँ
लूट लो तुम ये हवाएँ
मैं बवंडर चाहता हूँ
काश,जिंदगी सचमुच किताब होती
पढ़ सकता मैं कि आगे क्या होगा?
क्या पाऊँगा मैं और क्या दिल खोयेगा?
कब थोड़ी खुशी मिलेगी, कब दिल रोयेगा?
काश जिदंगी सचमुच किताब होती,
फाड़ सकता मैं उन लम्हों को
जिन्होने मुझे रुलाया है..
जोड़ता कुछ पन्ने जिनकी यादों ने मुझे हँसाया है…
खोया और कितना पाया है?
हिसाब तो लगा पाता कितना
काश जिदंगी सचमुच किताब होती,
वक्त से आँखें चुराकर पीछे चला जाता..
टूटे सपनों को फिर से अरमानों से सजाता
कुछ पल के लिये मैं भी मुस्कुराता,
काश, जिदंगी सचमुच किताब होती।
Kya khaak tarakki ki hai is duniya ne😒
Ishq ke mareez to aaj bhi be ilaaj bethe hain😕
क्या खाक तरक्की की है इस दुनिया ने,😒
इश्क के मरीज़ तो आज भी बे इलाज़ बैठे हैं।😕